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Showing posts from September, 2014

"हिन्दी हम सबकी,पर हिन्दी का कौन ?"

                    "हिन्दी हम सबकी,पर हिन्दी का कौन ?" भाषा किसी व्यक्ति की पहचान होती है , भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है।  ब्रिटिश लोग को हम अंग्रेज कहते  थे और आज भी वही कहते हैं आर शायद आगे भी यही कहते  रहें। क्यों ? क्योकि उनकी भाषा अंग्रेज़ी थी और वही उनकी पहचान बनकर रह गई। तो अगर हमारे हिन्दी पर खतरा होगी तो ये हमारे पहचान और अस्तित्व पर खतरा होगी।अगर आज हम हिन्दी  के विकास और अधिकार के लिए संघर्षरत  हैं  तो तो  इसका  मतलब  हम अपने अस्तित्व  और पहचान  के लिए संघर्षरत हैं और यह हमारे लिए गहन चिंतन  का विषय है।  इसे  हिन्दी का दुर्भाग्य ना कहें तो क्या कहें की हिन्दी भाषा तो  सबकी  है पर मातृभाषा किसी की नहीं ? हम जितने धीर  और गंभीर  अपने मातृभाषा और नवबाला अंग्रेजी के प्रति रहते हैं उतनी  ही धीर  और  गंभीर  अगर अपनी  हिन्दी  के ...

नैतिकता की दुहाई देना आसान है उसको क्रियान्यवित करना अत्यंत कठिन।

नैतिकता की दुहाई  देना आसान है उसको क्रियान्यवित करना अत्यंत कठिन। यही बात भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस  के संबंध में  सही बैठती  है की जब  आपात काल के दशक में जब कांग्रेस नीत सरकार जब बहुमत के अपने उफान पर थी तब उसने देश को तक़रीबन २५ साल तक नेता प्रतिपक्ष  विहीन रखा था जिस कारण संसद में विपक्ष की आवाज ही दब सी गयी थी और सारे नीति -नियुक्तियां सरकार स्वयं ले रही थी। ध्यान देने योग्य बात यह है  की उसी विपक्ष के आभाव ने कांग्रेस सरकार को अहंकार के पराकाष्ठा पर ला खरा किया था जिस कारण देश  को हिला देने वाली घपले-घोटालों ,तुस्टीकरण के समस्या से  दो-चार होना पड़ा था ,उदाहरणार्थ  बोफोर्से  ,शाहबानो ,एवं तथाकथित बाबरी मस्जिद के द्वार के ताले तोड़ना जैसे  मामले घटित हुए थे।  आज वही नेता नैतिकता और संविधान की दुहाई दे रहे हैं जो उस समय सरकार के फैसले को संविधान सम्मत और लोकतान्त्रिक अधिकार की बात कर रहे थ ,और तो और संप्रग सरकार -२  में जब केंद्रीय सतर्कता आयुक्त  की नियुक्ति में भी नेता प्रतिपक...