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ट्रम्प के जीत के मायने

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आप चाहे ट्रम्प को पसंद करे या फिर नापसंद करें लेकिन आप ट्रम्प को नकार नहीं सकते। यह उक्ति डोनाल्ड ट्रम्प पर सटीक बैठती है। ऐसी ही गलती तमाम वैश्विक ताकतों , बुद्धिजीवियों सहित मीडिया जगत ने भी की और डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जीत कर समूचे विश्व को भौंचक्के में डाल दिया। 2008 मे जिस तरह अमेरिका ने अपने इतिहास मे पहली बार किसी अश्वेत को राष्ट्रपति बनाया था तो इसे ऐतिहासिक घटना माना गया था ठीक उसी तरह 2016 में अमेरिका ने एक बार फिर ट्रम्प को चुन कर इतिहास रचा है। एक ऐसा उम्मीदवार जिसके पास ना तो कोई सियासी अनुभव था और ना ही कोई सरकारी पद संभालने का तजुर्बा। ट्रम्प  ने अपनी पार्टी के कुल 16 उम्मीदवारों को पछाड़ते हुए रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से सदारती उम्मीदवारी हासिल की और तमाम सर्वेक्षणों , कयासों को झुठलाकर कुल 48% से भी ज्यादा मतों के साथ अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति बने। हालांकि विशेषज्ञ उन्हे डेमोक्रेटिक पार्टी की कद्दावर नेता हिलेरी क्लिंटन के मुक़ाबले कमजोर आंक रहे थे और सर्वेक्षण भी कुछ इसी तरह के इशारे कर रहे थे. हर सर्वेक्षणों मे हिलेरी , ट्...

बैकफूट पर पाक सरकार और उसकी विदेश नीति

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साल 2016 भारतीय विदेश नीति और खासकर पाकिस्तान के साथ संबंध के हवाले से काफी तल्खी और उतार चढ़ाव वाला रहा। पिछले साल 25 दिसंबर को जब प्रधानमंत्री मोदी ने अफगानिस्तान से लौटकर पाकिस्तान जाने का फैसला किया था तो इसे भारत-पाक रिश्तों के लिहाज से ऐतिहासिक फैसला माना गया। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पाकिस्तानी समकक्ष को उनके वर्षगांठ पर उनके घर जाती-उमरा , लाहौर जा कर व्यक्तिगत रूप से बधाई दी और उनकी नतनी की सगाई में भी शरीक हुए जिसे दोनों देशों के संबंध सुधारने की दिशा में एक ठोस और लीक से हटकर उठाया गया कदम माना गया।  प्रधानमंत्री मोदी का इस तरह अचानक पाकिस्तान जाने के कारण उन्हे भारत मे सदीद- तनकीद का भी सामना करना पड़ा। इसके फौरन बाद जैसा की आशंका थी पाकिस्तान इस कदम का जबाब हमले के रूप में देगा और हुआ भी ठीक ऐसा ही। पाक प्रायोजित आतंकवादियों ने भारत के पठानकोट आर्मी बेस पर हमला कर दिया जिसके कारण हमारे करीब 10 बहादुर जवानो की शहादत हुई। यह तोहफा पहली बार नहीं दिया गया था । इससे पहले भी कारगिल के रूप में पाकिस्तान ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी जी के साथ छल किया था जो उनकी लाहौर ब...

ब्रिक्स से पाकिस्तान को कड़ा संदेश देने की जरूरत

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भारत के तटीय राज्य गोवा में आगामी 15 और 16 अक्टूबर को भारत की मेजबानी और अध्यक्षता में आठवीं ब्रिक्स शिखर सम्मलेन का आयोजन हो रहा है. ऐसे समय में ,  जब समूचा विश्व आतंकवाद ,  राजनीतिक  संकट ,  सुरक्षा  चिंता , और आर्थिक  मंदी  जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है वैसे में ब्रिक्स जै से  वैश्विक संगठनो का महत्व अपने आप बढ़ जाता है.   भारत इस शिखर सम्मलेन में आतंकवाद का मुद्दा जोर-शोर से उठाएगा.    इस बार ब्रिक्स शिखर बैठक का आयोजन  वैश्विक आतंकवाद  समस्या  और मेजबान देश भारत में  हाल ही में  हुए पठानको ट ,   उड़ी जै से  सिलसिलेवार हमलों के छाया में हो  रहा है। भारत ने हाल में ही उड़ी हमले में अपने 20 जवानो की सैन्य शहादत झेला है जिसका समूचे विश्व ने कड़ी आलोचना की है और आतंकवाद को वैश्विक चुनौती माना है।  इस शिखर सम्मलेन में आतंकवाद सबसे बड़ा मुद्दा होगा. भारत पड़ोसी पाकिस्तान को इन आतंकी हमलों का जिम्मेवार मानता है ,   जिसके प्रधानमंत्री बुरहान वाणी जैसे आतंकवादी को जिसे भारत की सेना ने म...

बौद्धिक दिवालियापन का शिकार पाकिस्तानी मीडिया

किसी ने बहुत ही वाजिब कहा था की मीडिया लोकतंत्र का चौथा खंभा होता है , तो किसी ने आगे बढ़ते हुए कहा कि मीडिया लोकतंत्र का आत्मा होता है . मीडिया जनमत का प्रतिनिधित्व करता है , उसका निर्माण करता है . परंतु पाकिस्तानी मीडिया की मौजूदा हालात को देखकर तो कहीं से नहीं कहा जा सकता है , कि वह इन पैमानों पर खरा  उतरता है . अगर वैश्विक मीडिया की विषयवस्तु , प्रस्तुति और तकनीक की बात करें तो हम कह सकते हैं कि पाक मीडिया अभी पैदा भी नहीं हुआ है . वैश्वीकरण के इस दौर में जहां विश्व मीडिया अपनी मजबूरी के कारण समूचे विश्व को अपने विषय वस्तु मे शामिल कर रहें है , वहीं पाक मीडिया अभी भी भारत पर ही अटकी हुई है। यह तो वही बात हुई ना की जहां विश्व की मीडिया अब खबर से आगे की बात कर रही है और शोध आधारित कन्टेन्ट पर ज़ोर दे रही है , वहीं पाकिस्तानी मीडिया अभी तक पेड न्यूज़ प्रोग्राम से बाहर नहीं निकल पाई है . कभी मोदी इस्लाम के दुशमन करार दिये जाते हैं तो कभी नवाज के दोस्त जो एक मुसलमान ही हैं .   चार चीज़ें पाक मीडिया में छाए रहते है , वह है कि , आज कि इंडिया की क्या लीड है ?, ...

"कितना अलग मोदी का पाँच देशों का विदेश दौरा "

  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 5 देशों का विदेश दौरा कई मायनों मे महत्वपूर्ण है। पाँच दिवसीय क्रमशः अफगानिस्तान , क़तर , स्विट्जरलैंड , अमेरिका एवं मेक्सिको का दौरा भारतीय विदेश नीति को मजबूत करने और भारत की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। प्रधानमंत्री मोदी अपने दौरे की शुरुआत रणनीतिक और आर्थिक लिहाज से अतिमहत्वपूर्ण हेरात शहर स्थित सलमा डैम के उदघाटन से की। भारत द्वारा 1700 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित इस डैम को अफगान सरकार ने भारत- अफगानिस्तान मैत्री बांध का नाम दिया है। यह डैम अफगानी जनता का 30 साल पुराना सपना था ।  उदघाटन के अवसर पर दिये अपने सम्बोधन मे प्रधानमंत्री मोदी ने अफगानिस्तान को भविष्य मे भी उसके विकास और जरूरत के लिए हरसंभव मदद का वायदा किया। इस अवसर पर अफगानी सदर अशरफ गनी ने प्रधानमंत्री मोदी को अफगानिस्तान के सर्वोच्च नागरिक सम्मान “ अमीर अमानुल्ला सम्मान” से नवाजा। ज्ञातव्य हो की प्रधानमंत्री का यह दूसरा अफगान दौरा था । इससे पहले उन्होने दिसम्बर मे काबुल का दौरा किया था और भारत द्वारा नवनिर्मित अफगानी संसद भवन का उदघाटन कि...

घड़ियाली आँसू

कितना विचित्र और हास्यास्पद है नेताओं द्वारा यह कहना की केंद्र सरकार सीबीआई का दुरूपयोग कर रही है, और वह बदले की भावना से ऐसा कर रही हैं। जबकि वही नेता अपने विपक्षी नेताओं पर प्रथम दृष्टया आरोप पर ही सीबीआई जांच की  मांग का राग अलापते रहते है। हाँ यही सही है कि सीबीआई केंद्र के हाथ में है और केंद्र सरकारें समय-समय पर इसका उपयोग अपना हित साधने के लिए करती रही है। दुरुपयोग बानगी तब दिखी थी जब कांग्रेस और द्रुमक का गठबंधन का खात्मा हुआ था उसी के एक दिन बाद सीबीआई ने करूणानिधि के बेटे एम.के.स्टॉलिन  के घर छापा मारी थी । उस दिन सीबीआई के नियत और कार्रवाई के समय पर सवालिया निशान लगा और दुरुपयोग के आरोपों को बल मिला। ऐसे कई उदाहरण है। परन्तु हर बार ऐसा ही हो यह जरुरी नहीं। ताजा मामला एन.आर.एच.एम घोटाले का आरोप झेल रहीं बसपा सुप्रीमो और उनके तत्कालीन कैबिनेट सहयोगी बाबू सिंह कुशवाहा से सीबीआई के पूछताछ का है। मायावती ने तत्काल प्रभाव से संवाददाता सम्मलेन कर उनके दलित होने के कारण परेशान करने का आरोप केंद्र सरकार पर मढ़ा। बसपा सुप्रीमो के राजनीत...

सैद्धांतिक सहमति

   राजनीति और नेताओं के दोहरे चरित्र को समझना टेढ़ी खीर होती है। अब देखिये ना अपने को भ्रष्टाचार का दुश्मन और सुशासन का झंडाबरदार कहने वाले नीतीश और केजरीवाल ने एक दूसरे से राजनीतिक गठजोड़ कर लिया है। जबकि केजरीवाल और नीतीश, लालू शासन काल के जंगलराज पर सोची- समझी चुप्पी साधे हुए है अर्थात नीतीश - लालू के गठजोड़ पर केजरीवाल की सैद्धांतिक सहमति मिल गयी है। परन्तु एक कहावत है जिससे केजरीवाल और नीतीश कुमार बच नहीं पाएंगे, की काजल के कोठरी में चाहे लाखो जतन करो, काजल के दाग भाई लागे ही लागे, भाई लागे ही लागे। केजरीवाल के प्रमाणपत्र देने से नीतीश कुमार बच नहीं सकते।  मौजू सवाल तो उनसे पूछे ही जाने चाहिएं की आखिर क्यों उन्होंने ऐसे व्यक्ति से हाथ मिलाया जिसने बिहार को पिछड़ेपन, गरीबी, अशिक्षा और जंगलराज के गर्त में धकेल दिया था ? ऐसी क्या जरुरत और मज़बूरी आन पड़ी की बिहार को शर्मसार कर देने वाले चारा घोटाले के सूत्रधार से उन्होंने हाथ मिला लिया ? बिहारियों को पलायन और जलालत झेलने को मजबूर कर देने वाले व्यक्ति और...