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Showing posts from August, 2015

सैद्धांतिक सहमति

   राजनीति और नेताओं के दोहरे चरित्र को समझना टेढ़ी खीर होती है। अब देखिये ना अपने को भ्रष्टाचार का दुश्मन और सुशासन का झंडाबरदार कहने वाले नीतीश और केजरीवाल ने एक दूसरे से राजनीतिक गठजोड़ कर लिया है। जबकि केजरीवाल और नीतीश, लालू शासन काल के जंगलराज पर सोची- समझी चुप्पी साधे हुए है अर्थात नीतीश - लालू के गठजोड़ पर केजरीवाल की सैद्धांतिक सहमति मिल गयी है। परन्तु एक कहावत है जिससे केजरीवाल और नीतीश कुमार बच नहीं पाएंगे, की काजल के कोठरी में चाहे लाखो जतन करो, काजल के दाग भाई लागे ही लागे, भाई लागे ही लागे। केजरीवाल के प्रमाणपत्र देने से नीतीश कुमार बच नहीं सकते।  मौजू सवाल तो उनसे पूछे ही जाने चाहिएं की आखिर क्यों उन्होंने ऐसे व्यक्ति से हाथ मिलाया जिसने बिहार को पिछड़ेपन, गरीबी, अशिक्षा और जंगलराज के गर्त में धकेल दिया था ? ऐसी क्या जरुरत और मज़बूरी आन पड़ी की बिहार को शर्मसार कर देने वाले चारा घोटाले के सूत्रधार से उन्होंने हाथ मिला लिया ? बिहारियों को पलायन और जलालत झेलने को मजबूर कर देने वाले व्यक्ति और...

बैकफूट पर वसुंधरा ।

टाइटल -  बैकफूट पर वसुंधरा       राजस्थान के हालिया शहरी निकाय चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए थोड़ी खुशी और थोड़ा गम वाली रही । सत्तारूढ़ भाजपा ने निकाय के 129 सीटों मे से कुल 43 पर कब्जा जमाया जबकि काँग्रेस के हाथ कुल 16 सीटें ही लगीं, वहीं अन्य के हाथ कुल 12 सीटें लगीं और 57 मे त्रिशंकु स्थिति है यानि किसी भी पक्ष को बहुमत नहीं मिली है। वैसे नतीजे वसुंधरा के लिए ठीक नहीं रहे क्योंकि पार्टी को उनके विधानसभा और गृहक्षेत्र झालावाड़ और झालपाटन मे हार का मुंह का देखना पड़ा है। आंकड़ों के लिहाज से तो वसुंधरा और पार्टी ने बढ़त हासिल कर ली है परंतु सियासी समीकरणों और गणित के हिसाब से उसे सोचने को मजबूर कर दिया है। वैसे निकाय चुनाव नतीजों पर सत्ताधारी दल का प्रभाव रहता है और उसका पलड़ा भाड़ी  होता  है ऐसे में वसुंधरा के लिए स्थिति और भी जटिल हो गयी थी और हर कोई भाड़ी जीत की अपेक्षा कर  रहा था, परंतु नतीजे संतोष करने भर की रही । "ललितगेट " के साये में हुए इस चुनाव मे वसुंधरा के लिए करो या मरो जैसी स्थिति थी। पूरे प्रकरण ने वसुंधरा राजे को आलाकमान के सामने रक्षात्मक होने ...

एक बार फिर मिथिला की उपेक्षा

शायद पिछड़ापन और उपेक्षा मिथिलांचल की नियति बन चुकी है। इतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध यह धरती विगत कई सालों से राजनीतिक उपेक्षा का शिकार है। भगौलिक और बुनियादी कारणों से यहाँ के लोगों को पलायन करने को मजबूर होना पड़ रहा है। मिथिला प्रक्षेत्र बाढ़ की भाड़ी तबाही से जूझता रहता है, ऐसे में मिथिला को विशेष पैकेज और संरक्षण की जरूरत है। कोशी, गंडक और करेह से लोगों को भाड़ी तबाही झेलनी पड़ती है, वह भी मिथिला के ही भाग्य में है। तकरीबन 20 से 25 जिलों तक फैला यह क्षेत्र विकास की बाट आज  भी जोह रहा है। कल प्रधानमंत्री ने एक लाख पैंसठ हजार हजार करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की है , और इन पैसों का जो आधिकारिक आवंटन किया गया है उसमे मिथिला के लिएकुछ भी नहीं है। एक भी राष्ट्रिय स्तर का अस्पताल नहीं, विश्वविद्यालय नहीं, हवाई अड्डा नहीं और तो और स्मार्ट सिटि भी नहीं ऐसे मे हम कैसे ना कहें हमारे सियासतदान महज सियासी नफा नुकसान के कारण इस क्षेत्र की अनदेखी कर रहे हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में समाज और इस क्षेत्र के लोगों मे भाड़ी रोष व्याप्त हो जाएगी , और यही रोष एक और झारखंड की ओर ब...

पाक की बिसात।

पाकिस्तान के पास मोहरों की कमी नहीं है, परंतु ये मोहरे कब और कैसी चाल चल देंगे ये खुद पाकिस्तान को भी पता नहीं होता है। हाँ अगर किसी को पता होता भी है, तो इतना तो तय है पाक हुक्मरान को पता नहीं होता की हो क्या रहा। दरअसल पाकिस्तान की कमान या यौं कहें गुप्त सत्ता, सेना और आईएसआई के पास है, चुनी हुई सरकारें तो बस कठपुतली है, इतिहास गवाह है पाकिस्तानी सियासत का। अब आते हैं असल मुद्दे पर , पाकिस्तान हर संधि और बातचीत के लिए जितना जल्दी तैयार हो जाता है उतनी जल्दी वह पलटी भी मार लेता है या फिर कोई ना कोई व्यवधान पैदा कर ही देता है। अब हालिया संदर्भ को ही देख लें, पहले से प्रस्तावित दोनों देशों के सुरक्षा सलहकार स्तर की बातचीत से पहले अड़ंगा लगाने की कोशिश खुद पाक की तरफ से की गयी है। बातचीत के पूर्व संध्या पर ही अलगाववादियों को दावत पर बुलाना पाकिस्तान के बातचीत और शांति प्रक्रिया मे अविश्वास को दर्शाता है, साथ ही यह भी दर्शाता है की पाकिस्तान सरकार कितनी लाचार और बेबस है। वरना कोई चुनी हुई सरकार इस तरह का व्यवहार नहीं करती है, वह भी यह जानते हुए की इससे पहले भी इसी तरह के व्यवहार के कारण ...

सियासी भंवर में जीएसटी

इसे देश का दुर्भाग्य ना कहें तो क्या कहें की हमारे सियासतदान देशहित जैसे अतिमहत्वपूर्ण मसलों पर भी सियासत करने पर उतारूँ हैं। सियासत के हालिया संदर्भ को देखें तो आर्थिक ...