एक बार फिर मिथिला की उपेक्षा
शायद पिछड़ापन और उपेक्षा मिथिलांचल की नियति बन चुकी है। इतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध यह धरती विगत कई सालों से राजनीतिक उपेक्षा का शिकार है। भगौलिक और बुनियादी कारणों से यहाँ के लोगों को पलायन करने को मजबूर होना पड़ रहा है। मिथिला प्रक्षेत्र बाढ़ की भाड़ी तबाही से जूझता रहता है, ऐसे में मिथिला को विशेष पैकेज और संरक्षण की जरूरत है। कोशी, गंडक और करेह से लोगों को भाड़ी तबाही झेलनी पड़ती है, वह भी मिथिला के ही भाग्य में है। तकरीबन 20 से 25 जिलों तक फैला यह क्षेत्र विकास की बाट आज भी जोह रहा है। कल प्रधानमंत्री ने एक लाख पैंसठ हजार हजार करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की है , और इन पैसों का जो आधिकारिक आवंटन किया गया है उसमे मिथिला के लिएकुछ भी नहीं है। एक भी राष्ट्रिय स्तर का अस्पताल नहीं, विश्वविद्यालय नहीं, हवाई अड्डा नहीं और तो और स्मार्ट सिटि भी नहीं ऐसे मे हम कैसे ना कहें हमारे सियासतदान महज सियासी नफा नुकसान के कारण इस क्षेत्र की अनदेखी कर रहे हैं। अगर ऐसा ही चलता रहा तो आने वाले समय में समाज और इस क्षेत्र के लोगों मे भाड़ी रोष व्याप्त हो जाएगी , और यही रोष एक और झारखंड की ओर बिहार को धकेल सकता है। अतः हमारे हुक्मरानो को समय रहते चेतने की जरूरत है एवं बराबर का विकास करने की जरूरत है।
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