घड़ियाली आँसू


कितना विचित्र और हास्यास्पद है नेताओं द्वारा यह कहना की केंद्र सरकार सीबीआई का दुरूपयोग कर रही है, और वह बदले की भावना से ऐसा कर रही हैं। जबकि वही नेता अपने विपक्षी नेताओं पर प्रथम दृष्टया आरोप पर ही सीबीआई जांच की  मांग का राग अलापते रहते है। हाँ यही सही है कि सीबीआई केंद्र के हाथ में है और केंद्र सरकारें समय-समय पर इसका उपयोग अपना हित साधने के लिए करती रही है। दुरुपयोग बानगी तब दिखी थी जब कांग्रेस और द्रुमक का गठबंधन का खात्मा हुआ था उसी के एक दिन बाद सीबीआई ने करूणानिधि के बेटे एम.के.स्टॉलिन  के घर छापा मारी थी । उस दिन सीबीआई के नियत और कार्रवाई के समय पर सवालिया निशान लगा और दुरुपयोग के आरोपों को बल मिला। ऐसे कई उदाहरण है। परन्तु हर बार ऐसा ही हो यह जरुरी नहीं। ताजा मामला एन.आर.एच.एम घोटाले का आरोप झेल रहीं बसपा सुप्रीमो और उनके तत्कालीन कैबिनेट सहयोगी बाबू सिंह कुशवाहा से सीबीआई के पूछताछ का है। मायावती ने तत्काल प्रभाव से संवाददाता सम्मलेन कर उनके दलित होने के कारण परेशान करने का आरोप केंद्र सरकार पर मढ़ा। बसपा सुप्रीमो के राजनीति करने का पुराना तरीका है। पुराने ताज कॉरिडोर मामले में भी जब -जब उनसे पूछताछ की संभावना बनती थी तो भी वो ऐसा ही घड़ियाली आंसू बहाया करती थीं। बहनजी से यह सवाल तो बनता ही है की अगर आप पाक -साफ हैं ही तो डरने की बात क्या है आप डटकर सामना कीजिये ? दरअसल चार साल पुराने इस मामले मे घेरेबंदी से पूरी पार्टी बैकफूट पर आ गयी है और खुद मायावती सकते में है। बहनजी  के परेशानी की भी अपनी वजह भी है, दरअसल बहनजी के पास ना तो राज्य मे सत्ता है और ना ही केंद्र मे सौदे वाली स्थिति, क्योंकि विगत लोकसभा चुनाव में उनके पार्टी का पुलिंदा शून्य पर सिमट कर रह गया था। बसपा सुप्रीमो इतने दिनों तक तो संप्रग सरकार से अपने सांसदो का सौदेबाजी करती आ रही थी परंतु अब मामला प्रतिकूल हो गया है सो बहनजी असहाय दिख रही है। राज्य विधानसभा सन्निकट है उसकी परेशानी अलग, बहन जी चुनाव की तैयाऋ करेंगी या सीबीआई से निपटेंगी यही देखना दिलचस्प है और यही9 मायावती जी का भी परेशानी। मायावती जी के आदतों में शुमार रहा है सत्ता पर आरोप लगाना और फिर उसी सत्ताधारी दल को मौन समर्थन देना । हालांकि देश अब इन नेताओं के दोहरे चरित्र को समझना शुरू कर दिया है की कैसे ये दल और नेता समय के हिसाब से अपना स्टैंड बनाते है और जब समय साथ न दे तो राय बादल लेते है। तभी तो मायावती को जनता ने सत्ता से बेदखल कर दिया था।
                                                                

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