ट्रम्प के जीत के मायने






आप चाहे ट्रम्प को पसंद करे या फिर नापसंद करें लेकिन आप ट्रम्प को नकार नहीं सकते। यह उक्ति डोनाल्ड ट्रम्प पर सटीक बैठती है। ऐसी ही गलती तमाम वैश्विक ताकतों, बुद्धिजीवियों सहित मीडिया जगत ने भी की और डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जीत कर समूचे विश्व को भौंचक्के में डाल दिया। 2008 मे जिस तरह अमेरिका ने अपने इतिहास मे पहली बार किसी अश्वेत को राष्ट्रपति बनाया था तो इसे ऐतिहासिक घटना माना गया था ठीक उसी तरह 2016 में अमेरिका ने एक बार फिर ट्रम्प को चुन कर इतिहास रचा है। एक ऐसा उम्मीदवार जिसके पास ना तो कोई सियासी अनुभव था और ना ही कोई सरकारी पद संभालने का तजुर्बा। ट्रम्प ने अपनी पार्टी के कुल 16 उम्मीदवारों को पछाड़ते हुए रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से सदारती उम्मीदवारी हासिल की और तमाम सर्वेक्षणों, कयासों को झुठलाकर कुल 48% से भी ज्यादा मतों के साथ अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति बने। हालांकि विशेषज्ञ उन्हे डेमोक्रेटिक पार्टी की कद्दावर नेता हिलेरी क्लिंटन के मुक़ाबले कमजोर आंक रहे थे और सर्वेक्षण भी कुछ इसी तरह के इशारे कर रहे थे. हर सर्वेक्षणों मे हिलेरी, ट्रम्प पर बढ़त बनाए हुए थीं और तो और चुनावी प्रचार के दौरान हुए तीनों बहसों में हिलेरी बाजी मारने मे सफल हुईं थीं। इतनी जटिल चुनावी प्रक्रिया जहाँ राष्ट्रपति चुनाव के साथ- साथ गवर्नर, सीनेट, और कुछेक मुद्दों पर जनमत संग्रह भी कराए जाते हैं जिसमें कुछेक मुद्दे जैसे ज्यादा टैक्स लगाना , स्वास्थय योजनाओं से सम्बंधित मुद्दों पर जनता की राय भी साथ ही साथ ले ली जाती है. ऐसे में अमेरिका में बिना मीडिया के समर्थन से चुनाव जितना असंभव सा है फिर भी डोनाल्ड ट्रम्प ने तमाम विरोध, तनक़ीद के बाबजूद मीडिया समर्थित उम्मीदवार हिलेरी को पटखनी देने में कामयाब हो गए . 


अब तो ट्रम्प गद्दी पर बैठ चुके हैं. उनके पहले भाषण जो कि  उन्होंने शपथ ग्रहण के दौरान दी उसमें  उन सभी घरेलु मुद्दों को जगह दी जिसको उन्होंने चुनावी मुद्दा बनाया था मसलन,  उन्होंने सत्ता को वाशिंगटन से जनता को हस्तांतरित करने की समाजवादी बात की. उन्होंने दुनिया से इश्लामिक चरमपंथ को को ख़त्म करने, स्त्री, गरीब के फिर से भलाई के लिए आगे लेन सहित ऐसे मुद्दों को उठाया जो उनके जीत का कारण बना. उन्होंने दूसरे देशों के अमीर बनने और अमेरिका की अर्थव्यवस्था के खस्ता हालात बनाने को लेकर अपने पूर्ववर्तियों पर जमकर तंज कसा. 
ऐसे ही लोकलुभावन मुद्दों से उनको जमकर वोट मिला जिसकी झलक आंकड़ों को देखकर साफ़ पता चलता है.  

आंकड़ों पर नजर दौड़ाए तो ट्रम्प को सबसे ज्यादा वोट बेरोजगार, मजदूर तबका जो की परंपरागत तौर पर डेमोक्रेट्स के वोटर माने जाते हैं, और युवाओं ने दिया है। इन तबकों को उम्मीद था की ट्रम्प उनके लिए रोजगार के बेहतर अवसर उपलब्ध कराएंगे जो की दिन प्रतिदिन खत्म होते जा रहे है और जो बचे भी हैं वह प्रवासियों द्वारा हथिया लिया जा रहा है। ट्रम्प  को 67 % ऐसे लोगों ने वोट दिया है जिनके पास कोई कॉलेज डिग्री नहीं है। जबकि 37% युवाओं ने 70 साला उम्मीदवार पर अपना भरोसा जताया जिनकी उम्र महज 19 से 24 वर्ष के बीच की है। वहीं हिलेरी को 88% मत काले तबकों के वोटरों ने दिया है , तो 65% हिस्पेनिकों ने हिलेरी में विश्वास जताया। 

प्रचार के दौरान भी ट्रम्प ने अमेरिकियों के लिए बेहतर रोजगार के अवसर, सुरक्षा और स्वास्थ्य का वायदा किया था जिसका उन्हे फायदा भी मिला। हालांकि ये सारे मुद्दे परंपरागत तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी द्वारा उठाए जाते रहे हैं यह अलग बात है की ट्रम्प ने बेहद चालाकी से इन मुद्दों को लपका और भुनाया भी। सोशलिश्ट बर्नी सैडर्स हालांकि इन्हीं मुद्दों को उठाया जरूर परंतु ख़िताबी भीरंत में खुद के घर में ही मात खा गए। चौकने वाली बात यह रही की ट्रम्प अन्य राष्ट्रपति प्रत्याशियों के मुक़ाबले सबसे कम पैसा टीवी चैनलों को मैनेज और विज्ञापन के लिया किया। सीएनएन, फॉक्स, न्यूयार्क टाइम्स आदि मीडिया हाउस ने तो ट्रम्प के खिलाफ लगातार अपना रुख बनाए हुए था जिसकी ट्रम्प ने काफी आलोचना भी की और सीएनएन को तो लोग क्लिंटन न्यूज़ नेटवर्क तक कहने लगे थे। मीडिया द्वारा ट्रम्प विरोधी रुख अपनाए रखना ट्रम्प के लिए तुरुप का इक्का साबित हुआ और लोगों में ट्रम्प के प्रति सहानभूति उत्पन्न हो गयी। ट्रम्प लंबी चौड़ी बात ना करते हुए सीधी और उन्हीं मुद्दों को उठाया जो लोग सुनना चाहते थे। 

डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी अवाम के अमेरिका सर्वश्रेष्ठ और अमेरिकी राष्ट्रवाद को उकसाया और तमाम ऐसे मुद्दे जो अमेरिकी अवाम के दिल के अंदर थे पर वह अमेरिका की उदारवादी समाज की छवि के कारण बाहर नहीं आ पा रहे थे, को मसला बनाया और अमेरिका को फिर से महान बनाने का नारा दिया। 

अमेरिका मे करीब 67% वास्प अर्थात (व्हाइट, एंग्लो, सैक्सन, और प्रोटेस्टेंट) बहुसंख्यक हैं जिन्हें डर था की वो धीरे धीरे कहीं अल्पसंख्यक ना बन जाएँ। अमेरिका में प्रोटेस्टेंट ईसाई ही बहुतायत में हैं या यूं कहें उनका ही अमेरिका मे राज है। जिस तरह से हिस्पेनिक सहित दुनिया भर से प्रवासी अमेरिका मे जा रहे थे और वहीं बस जा रहे थे इससे वहाँ के इन मूल तबकों में खुद के गोरी और मूल संस्कृति के खत्म होने का डर साता रहा था। अमेरिका के लोगों मे इन प्रवासियों मे इनके प्रति डर और खौफ भी बढ़ता जा रहा था जो की बहुत पहले से पनप रहा था क्योंकि ये प्रवासी बहुत ऊंचे ऊंचे ओहदों पर बैठे हैं और इनका एक तरह से राज भी माना जाता है। 


अमेरिका को मौंकों का देश कहा जाता है लेकिन सिर्फ अमरीकी गोरों के लिए ना की प्रवासियों के लिए. इसी बात का इजहार इन वास्प तबकों ने किया है। अमेरिका का डेमोग्राफिक स्थिति बदलने की डर जिसमें अमेरिकियों को लग रहा है की उनकी सांस्कृतिक पहचान, उनकी नौकरिया और उनका गोरी छवि और पावर के खत्म हो जाने का डर ने लोगों को ट्रम्प के प्रति आकर्षित किया। अमेरिकियों को वैश्वीकरण, सबसे ज्यादा खौफजदा कर रहा है। वैश्वीकरण ने किसी तीसरी दुनिया के देशो से ज्यादा अमेरिका को प्रभावित किया है चाहे वह आप्रवासियों के शक्ल में हो, चाहे वह नौकरियों के शक्ल में हो, या फिर आतंकवाद के शक्ल में हो इन सारे मुद्दों ने अमेरिकी अवाम को ट्रम्प की ओर मुड़ने को मजबूर किया। 

अमेरिका आज भी अफगानिस्तान, इराक और तमाम खाड़ी देशों मे फंसा हुआ और चाह कर भी वह उससे पीछा नहीं छुड़ा पा रहा। इन लड़ाइयों की लपटों से आज समूचा विश्व झुलस रहा है। आईएसईएस, अलकायदा, और तालिबान भी अमेरिका की ही उपज है जो आज अमेरिकी सही तमाम विश्व के लिए सिरदर्द बने हुये हैं। एक और बात ट्रम्प के पक्ष में गयी  वह था सऊदी अरब पर मुकदमा चलाने का मामला।  2001 में हुए आतंकी हमलों में सऊदी सर्कार के कुछ अधिकारियों की संलिप्तता मानी जाती है। सऊदी सर्कार के इन अधिकारियों पर मामला चलाने की इजाजत अमेरिकी कॉंग्रेस ने दिया था पर राष्ट्रपति ओबामा ने इसे वीटो कर दिया जिससे लोगों में डेमोक्रेट्स के प्रति गुस्सा पैदा किया। 

अमेरिका सहित समूचा विश्व आज आतंकवाद और शरणार्थी संकट से जूझ रहा है । अमेरिका में चुनाव के दिनों में नस्लीय, आतंकी हमले भी हुए जिसमे इस्लामी कट्टरता और आतंकवाद को बहस के केंद्र में ला दिया और लोगों को ट्रम्प के रूप में  एक सख्त नेता का छवि नजर आया जो की इनसे निपट सकता है। ट्रम्प ने इन समस्याओं, मसलन आइसाइएस को पनपने देने के लिए ओबामा को जिम्मेदार ठहराया था।  दरअसल ट्रम्प उस पॉलिटिकल करेक्टनेस का शिकार हुए जिसका अनुसरण समूचा विश्व करता है। ट्रम्प ने हर वह बात की जिससे तमाम बौद्धिक और तथाकथित उदरवादी नेतागण बचा करते हैं। ट्रम्प ने मुसलमानों, प्रवासियों, मेक्सिकन हिस्पेनिकों सहित तमाम लोगों पर सख्ती की बात की जिससे अमेरिका आज प्रभावित है। चुनाव से पहले हुए हमलों ने चाहे वह बेल्जिउम हो या फिर पेरिस या फिर अमेरिका के अंदर के ही हमलों ने ट्रम्प के अपील को धार दी और लोग ट्रम्प के पक्ष में गोलबंद हुए। यह अलग बात है की अरब क्रांति के दौर में जब मुअम्मर गद्दाफ़ी की हलाकत के दौरान विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ही थी और तो और 2011 मे जब ओसामा बिन लादेन की हलाकत हुई थी तब भी विदेश मंत्री हिलेरी ही थी। इन दोनों मसलों में लीबिया और पाकिस्तान में अमेरिका का सीधा हस्तक्षेप था और इन देशों का संप्रभुता सीधा सीधा प्रभावित हुआ था। हिलेरी बतौर पद, और पार्टी उस फैसलों में में शामिल रहीं है जिसकी बात डोनाल्ड ट्रम्प कर रहे हैं। 

डोनाल्ड ट्रम्प के आने के बाद वर्ल्ड पोलिटिकल ऑर्डर( विश्व का राजनीतिक समीकरण) बिल्कुल बदल जाएगा। जो अमेरिका 60 के दशक से ही रूस से कूटनीतिक युद्ध लड़ रहा था उस कूटनीतिक युद्ध अथवा कटुता के सुधरने के आसार नजर आने लगें हैं। ट्रम्प ने चीन से मुक़ाबला करने के लिए रूस सहित अन्य शक्तियों को साथ लेने की बात की है। ट्रम्प पर लोग तनकीद कर रहे हैं कि जिस रूस से अमेरिकी नस्ल और पीढ़ी लड़ती रही वही आज रूस का पिट्ठू बनने जा रहा हैं। पर यही उदारवादी बौद्धिक तबका ओबामा द्वारा क्यूबा से संबंध पुनः स्थापित करने के सवाल पर चुप्पी साध जाते हैं। जबकि समूचा विश्व जानता है कि 60 के दशक में शीतयुद्ध कि शुरुआत ही क्यूबा से हुआ था। अमेरिका आज भी घोषित रूप से विश्व का महाशक्ति है और अभी चीन को अमेरिका की बराबरी करने में समय लगेगा। लेकिन यह भी सच है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था आज चरमरा रही है और उसकी पहले से स्थिति कमजोर हुई है। रूस ने  फिर से मध्य एशिया, यूरोप, खाड़ी के देशों मे अपना दखल बढ़ाया है। उक्रेन से क्रिमिया को जबरन लेना उसी दखल और ताकत का मुशायड़ा था। सीरिया में बशर अल असद को समर्थन देकर रूस ने तमाम सरकारों को एक संदेश दिया कि वह फिर से ताकत बनने जा रहा है और अगर वह उनका साथ देते हैं तो वे ऐसे ही किसी भी सत्ता विरोधी दखल को दबा सकते हैं। 

ट्रम्प ने नाटो पर हमला बोला है। यह सही भी है आज तक नाटो ने कोई भी लड़ाई नहीं जीती है। नाटो का भरण पोषण मुख्यतौर पर अमेरिका ही करता है जो कि उसके अर्थव्यवस्था के लिए बोझ है। नाटो कि प्रासंगिकता आज समझ से पड़े है। हाँ, यह अमेरिका के इतिहास और इज्जत से जुड़ा हुआ है। समूचा शीत युद्ध का दौर नाटो के इर्ध गिर्ध ही घूमा था। नाटो के सदस्य देश आज अमेरिका को ही आँखें दिखाने लगे हैं। तुर्की पुराना नाटो देश है परंतु आज वह अमेरिका के मुख्य प्रतिद्वंदी रूस के साथ है। तुर्की, सीरिया में साझे हमले को अंजाम दे रहा है। तुर्की ने रूस के एक विमान को पिछले साल मार गिराया था। और तो और तुर्की में ही रूसी राजदूत कि हत्या भी कर दी गयी परंतु पुतिन और अर्दोंआन ने बेहद समझदारी से संबंध और बातचीत को जारी रखा। तुर्की का आरोप है कि अमेरिका अब्दुल्ला गुलेन को शह दे रहा जो तुर्की मे पिछले साल हुए असफल तख्तापलट का आरोपी है। हालांकि गुलेन ने ऐसे किसी तख्तापलट में संलिप्तता से इंकार किया था। अमेरिका ने गुलेन को तुर्की को सौपने से इंकार कर दिया। इन्हीं वजहों से ट्रम्प नाटो के बजट कटौती को जायज़ ठहड़ा रहे हैं। वहीं ट्रम्प ने चीन को सीधे तौर पर निशाने पर लिया है।

 अभी चीन ही है जो अमेरिका को चुनौती दे रहा है। ट्रम्प ने ताइवान  के राष्ट्रपति से बात कर चीन को सीधा संदेश दिया था कि अमेरिका एक चीन नीति की समीक्षा कर सकता है। यह अमेरिका द्वारा ६० साल चीन नीति के बदलाव का प्रतीक था। इससे चीन बौखलाया गया और इस पर किसी तरह के  समझौते और बदलाव पर अमेरिका को चेतावनी दे डाली। इससे फिलिपिंस को दक्षिण चीन सागर मसले पर कुछ आस बंधी है। चीन इस मसले पर किसी तरह के फैसले को मानने से इंकार कर दिया था। ट्रम्प कि कोशिश भारत और रूस को साथ लेकर चीन को कंट्रोल करने कि होगी। हालांकि इसमें आशंका और जोखिम भी है।

ट्रम्प, का आना भारत के लिए फायदे और घाटे दोनों का सौदा साबित हो सकता है। दशकों से भारत की सारी ऊर्जा रूस और अमेरिका के साथ संबंध संतुलन बनाने मे खपत हो जाता थे परंतु अगर रूस और अमेरिका ही साथ आ जाएँ तो भारत के लिए आसान होगा रिश्ते सामान्य बनाए रखने में। वहीं ट्रम्प के बयान भारतियों के मन में कुछ आशंका भी पैदा करता है। ट्रम्प ने एच-01 वीजा नीति की समीक्षा करने की बात की है जिससे भारत से नौकरी और पढ़ाई के लिए अमेरिका जाने की चाह रखने वाले छात्रों के उम्मीदों को झटका भी लग सकता है। साथ ही ट्रम्प ने कॉर्पोरेट टैक्स कम करने का वादा किया जिसका परिणाम यह होगा की अमेरिकी कम्पनियाँ पुनः अमेरिका की तरफ रुख करेंगे।  भारत के लिए नए निवेश को आकर्षित करना मुश्किल होगा। इससे भारत  के विदेशी निवेश को बढ़ाने के प्रयास को झटका लग सकता है। 

हालांकि ट्रम्प ने भारत को अमेरिका एक अच्छा दोस्त और स्वाभाविक साझीदार बताया है और जिस तरह उन्होने प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ की और उनके साथ काम करने की इच्छा व्यक्त की है वह उत्साहित करने वाला है। भारत को अपने कदम फूँक फूँक कर उठाने होंगे क्योंकि ट्रम्प का रूस के प्रति रुख सामान्य है और रूस पाकिस्तान से अपने संबंध स्थापित करना चाह रहा है। रूस का हालिया कदम जिसमें  रूस, चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा ( सीपेक) में शामिल होने की इच्छा व्यक्त कर चुका है और तो और कुछेक महीनो पहले रूस ने पाक के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास किया जो की पाक के साथ बढ़ती निकटता की ओर संकेत कर रहे हैं। रूस आईएसआईएएस से निपटने के लिए तालिबन का सहयोग लेने की बात कर रहा है। ऐसे में भारत का विरोध बनता था और भारत ने सख्त लहजों में अपना विरोध जताया।


 अब अमेरिका का रुख देखने वाला होगा। जिस तालिबान ने भारत और अफगानिस्तान में आतंक मचा कर रखा है उससे दोस्ती की हिमायत भारत कभी नहीं कर सकता। हलाकि तालिबानी नेता गुलबद्दीन हिकमतयार से अफगान सरकारने समझौता कर लिया है. भारत, अफगानिस्तान में सबसे बड़ा निवेशक है और वह कभी नहीं चाहेगा की अफगानिस्तान फिर से तालिबान के कब्जे में जाए या फिर तालिबान फिर से अफगानिस्तान में अपना पैर जमाए। ट्रम्प के  आने से भारतियों में उम्मीद जगी है कि  जिस तरह चुनाव में ट्रम्प ने आतंकवाद पर सख्त बातें कीं थीं उस पर वो अमल भी करेंगे। भारत सीमापार आतंकवाद और प्रोक्सिवार का सबसे बड़ा भुक्तभोगी है. अमेरिका को पाकिस्तान और चीन के प्रति अपनी नीति स्पष्ट रखनी होगी। 

जो लोग ट्रम्प की काबिलियत पर शक कर रहे हैं उनको पता होनी चाहिए अमेरिका में इदारे( एजेंसियां) काम करते हैं और जहाँ इदारे अपने काम ईमानदारी से करती हों वहां कोई भी राष्ट्रपति आ जाए ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है. अमेरिका अपने यहाँ कानून का राज का दुहाई देता है. अमेरिका में सभी एजेंसिया स्वायत्त काम करते हैं. चाहे पेंटागन हो, सीआईए, एफबीआई हो या फिर अदालतें हो सभी अपना काम स्वतंत्रता से करते है और राष्ट्रपति भी उनकी मंशाओं को इंकार नहीं करता है क्योंकि सभी एक ही मेज पर एक काम 'अमेरिका पहले" के लिए करता है और इसी नारा को  ट्रम्प ने अपना चुनावी जुमला बनाया था जो की बहुत असरकारी साबित हुआ. 

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