"हिन्दी हम सबकी,पर हिन्दी का कौन ?"

                    "हिन्दी हम सबकी,पर हिन्दी का कौन ?"

भाषा किसी व्यक्ति की पहचान होती है , भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है।  ब्रिटिश लोग को हम अंग्रेज कहते  थे और आज भी वही कहते हैं आर शायद आगे भी यही कहते  रहें। क्यों ? क्योकि उनकी भाषा अंग्रेज़ी थी और वही उनकी पहचान बनकर रह गई। तो अगर हमारे हिन्दी पर खतरा होगी तो ये हमारे पहचान और अस्तित्व पर खतरा होगी।अगर आज हम हिन्दी  के विकास और अधिकार के लिए संघर्षरत  हैं  तो तो  इसका  मतलब  हम अपने अस्तित्व  और पहचान  के लिए संघर्षरत हैं और यह हमारे लिए गहन चिंतन  का विषय है। 
इसे  हिन्दी का दुर्भाग्य ना कहें तो क्या कहें की हिन्दी भाषा तो  सबकी  है पर मातृभाषा किसी की नहीं ?
हम जितने धीर  और गंभीर  अपने मातृभाषा और नवबाला अंग्रेजी के प्रति रहते हैं उतनी  ही धीर  और  गंभीर  अगर अपनी  हिन्दी  के  प्रति  रहें  तो  वो दिन  दूर नहीं जब हिन्दी  की भी पहचान  वैश्विक होगी और उसकी  बानगी दूर तलक जायेगी।हिन्दी के संवैधानिक  पक्ष  को खंगाल रहा था तो मैंने पाया  की हिन्दी और  संस्कृत को संविधान के आठवीं अनुसूची  शामिल किया गया है ,अब मन में प्रश्न उठी कि भाई आठवीं अनुसूची है क्या ??और आठवीं अनुसूची में शामिल होने का मानक क्या है ? इसी सवाल के मंथन के के दौरान  मैंने एक  विद्वान  भाई से पूछ बैठा की भैया ये बताइये की आठवीं अनुसूची में शामिल होने का मानक क्या है ? तो उन्होंने धरल्ले से जबाब दिया की जिस भाषा के १० लाख से ज्यादा बोलने वाले हों ,जिसकी अपनी साहित्यक इतिहास हो,जिसकी अपनी व्याकरण हो आदि। तो मैंने भी झट से पूछ डाला की तब अंग्रेजी क्यों नहीं इस सूची में शामिल है तो उन्होंने तार्किक जबाब दिया की अंग्रेजी हमारी भाषा नहीं है , यह बात सुन  कर मनो मन को तृप्ति मिल गई पर तुरंत मैंने  अपने भावना को संभाला और अपने  आप से प्रश्न किया की फिर  हिन्दी  और समस्त  भारतीय भाषाओ  को कैसे हाशिये पर धकेल दिया गया है।कोई  नहीं वरन हम ही और हिन्दी  भाषी छात्र ही हिन्दी की शल्य चिकित्सा  करते रहते हैं उदाहरणार्थ अगर हम हम कक्षा में जाते हैं तो और प्रवेश की अनुमति मांगते तो हैं कहते हैं ( "may i come in sir" ) अगर इसी वाक्य को अगर हम महाशय मैं जाऊँ कहदें तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा। इसे मैं अपना दुर्भाग्य न मानू तो क्या  मानू की अगर मैं अपने  ही  दोस्त  से अगर शुद्ध हिन्दी में बात करुँ तो वो कहते हैं की भाई कृपया कर साधारण भाषा में बात किया करो सर के ऊपर से गुजर जाता है। कहते हैं की लोकतन्त्र में हमेशा  गुणवत्ता ऊपर  संख्याबल का अधिपत्य  रहता है  हिन्दी  दुर्भाग्य देखिये की तकरीबन 63 करोड़ लोगों की  भाषा हिन्दी  और तक़रीबन 3 % भाषाई अंग्रेजी है इसकी   एकमात्र कारण हमारा औपनिवेशिक सोच से बहार नहीं निकल पाना है। हम काफी गर्व से कहते है की हमारी हिन्दी अच्छी नहीं है यार पर उन्हें शर्म करने  जरुरत है की उन्हें मातृभाषा तक उन्हें नहीं आती है। जो अपनी भाषा का ना हुआ वह दूसरे का  क्या होगा ? ये तो वही बात हुई ना की भाई ओहदा तो महरानी का पर काम नौकरानी का। 
हम ख़ुशफ़हमी में हैं की हिन्दी तो बढ़ रही है। पर कहाँ पर ? facebook,twiteer,google e.t.c पर क्या ? तो बढ़ रहा होगा पर ये बढ़त बहुत ही घातक होगा क्योकि किसी भी भाषा की आत्मा और बुनियाद उसकी व्याकरण , उसकी साहित्यक इतिहास ,बोल चाल,शब्द भण्डार, और सहजता  है, सारे इंटरनेट माध्यमों पर इसकी उपस्थिति पूर्ण नगण्य है। मुझे तो एक तरह से यह एक वैश्विक साज़िश जान पड़ती है की हिन्दी की बुनियाद ही हिला दो हिन्दी खुद बखुद  समाप्त  हो जायेगा। हमारे राजनेता भी हमें कम नहीं छलते हैं की वोट तो मांगते हैं हिन्दी में पर गद्दी मिलते ही अंग्रेजी पूजन।अंग्रेजी या अन्य कोई भाषा बुरी नहीं पर इनका उत्थान अन्य भारतीय भाषाओं को विस्थापित कर यह असहनीय है।जबकि देखा जाय तो पाते  हिन्दी की शब्दावली काफ़ी व्यापक और कल्पनात्मक है साथ ही इसकी व्याकरण काफी कार्यसाधक है। 
किसी भाषा का विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक की उसे रोजगार से ना जोड़ा जाए। हिन्दी को बोली से रोजी तक पहुँचाना होगा।हमें ये जान लेना चाहिए की  हम जितना बोएंगे उस से ज्यादा पायेंगे इसका तात्पर्य यह है की हम जितना हिन्दी का इस्तेमाल करेंगे और जितना ही इसे जियेंगे उतना ही हिन्दी का चहुँमुखी विकास होगा, नहीं तो देवलोक को पधार जाएगी देवनागरी हमारी। तब तो वही बात होगी ना की  भइया हिन्दी तो विश्व भाषा है पर मानता कौन है ठीक उसी प्रकार की नेता और तीसमारखां तो बहुत लोग हैं पर मानता कौन है?  

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