नैतिकता की दुहाई देना आसान है उसको क्रियान्यवित करना अत्यंत कठिन।

नैतिकता की दुहाई  देना आसान है उसको क्रियान्यवित करना अत्यंत कठिन।
यही बात भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस  के संबंध में  सही बैठती  है की जब  आपात काल के दशक में जब कांग्रेस नीत सरकार जब बहुमत के अपने उफान पर थी तब उसने देश को तक़रीबन २५ साल तक नेता प्रतिपक्ष  विहीन रखा था जिस कारण संसद में विपक्ष की आवाज ही दब सी गयी थी और सारे नीति -नियुक्तियां सरकार स्वयं ले रही थी। ध्यान देने योग्य बात यह है  की उसी विपक्ष के आभाव ने कांग्रेस सरकार को अहंकार के पराकाष्ठा पर ला खरा किया था जिस कारण देश  को हिला देने वाली घपले-घोटालों ,तुस्टीकरण के समस्या से  दो-चार होना पड़ा था ,उदाहरणार्थ  बोफोर्से  ,शाहबानो ,एवं तथाकथित बाबरी मस्जिद के द्वार के ताले तोड़ना जैसे  मामले घटित हुए थे।
 आज वही नेता नैतिकता और संविधान की दुहाई दे रहे हैं जो उस समय सरकार के फैसले को संविधान सम्मत और लोकतान्त्रिक अधिकार की बात कर रहे थ ,और तो और संप्रग सरकार -२  में जब केंद्रीय सतर्कता आयुक्त  की नियुक्ति में भी नेता प्रतिपक्ष की राय और आमसहमति बानाने का कोई सार्थक पहल नहीं किया गया। दूसरे पहलुओ को खंगाले तो हम देखते है की आज कांग्रेस पार्टी वर्तमान प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव श्री नृपेन्द्र मिश्रा के नियुक्ति के लिए लाये गए अध्यादेष का विरोध कर रही है जबकि उसे इस बात का भान नहीं हो रहा की जब उसी की सरकार ने दागियों के संरक्षण से संबंधित अध्याधेश लाने वक्त न विपक्ष से राय लेना न उचित समझा था और न ही सर्वदलीय आमसहमति बनाना जरुरी समझा। देश शुक्रगुजार होगा कांग्रेस उपाध्यक्ष का जिन्होंने ऐन मौके पर उसपे अपना वीटो लगा दिया, देश का दुर्भाग्य होता अगर वो अध्याधेश पारित हो जाता।
मैं नेता प्रतिपक्ष के नियुक्ति का विरोधी नहीं वरण मैं तो इसके नियुक्ति में संविधान सम्मत एवं नीतिसंगत कारवाई  का पक्षधर हुँ। नेताओ को ध्यान देने वाली बात है कि उनके हर आलोचना,व्यवहार,और कारवाई का दूरगामी परिणाम होता है। 

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