"मोदी, मीडिया और टी.आर.पी"

उपरोक्त तीनों शब्दों का संबंध चोली और दामन का है।
विगत 13 सालों से मोदी मीडिया के लिए trp का जरिया बने हुए हैं। 2002 दंगा के बाद से तो मोदी और मीडिया एक दूसरे के पूरक से बन गए हैं। मोदी का तीसरी बार मुख्यमंत्री के रूप में जीत से मीडिया के हाथ मोदी नाम का trp की चमची हाथ लग गयी है। मोदी की तारीफ़ हो या विरोध मीडिया के दोनों हाथ में लड्डू। हालाँकि मोदी के उत्थान में मीडिया का सबसे अहम् रोल है , इतना प्रचारित और प्रताड़ित किया की पाशा मोदी के पक्ष में जा बैठा। मीडिया क्या मोदी तो इन छुटभैयां नेताओं के लिए भी trp की जरिया हैं।
बहुतेरे नेताओं की रोजी रोटी तो मोदी विरोध के बल पर ही चलती है बजाय इसके उनका कोई जनाधार नहीं है। मोदी का खौफ ही आज जनता परिवार को एकजुट करने को मजबूर किया है । मुस्लिम वोट बैंक बनाने का एकमात्र जरिया विकास नहीं मोदी है। जब से मोदी प्रधानमंत्री बने हैं तब से सूत्रों के हवाले के खबर है वाला बवंडर ख़त्म सा हो गया है जो बहुतेरों को पच नहीं रहा है । अब तो प्रेस कॉन्फ्रेंस ही एकमात्र जरिया रह गया है खबर निकालने का। मोदी के आने के बाद से मीडिया प्रतिनिधिमंडल का विदेश दौरा भी बंद हो गया जो मीडिया को नागवार गुजर रहा है। खैर देखा जाए तो ठीक ही है विरोध होना भी जरुरी है परंतु दिक्कत तब आन पड़ती है जब सिर्फ विरोध के लिए विरोध होता है।

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