" आखिर विकास व सफलता का मानक क्या है ? "
फिर वही बात दोहराता हूँ । किसी भी सरकार के लिए एक साल का वक्त काफी कम होता है विकास के आकलन के लिए। जब कांग्रेस और कांग्रेस नीत गठबंधन सरकार को 60 साल और अटल जी की सरकार को 6 साल कम पड़ गए विकास के लिए तो वर्तमान राजग सरकार तो अभी पैरों पर खड़ा ही हुई है।
मैं सरकार की कतई से तरफ़दारी नहीं कर रहा हूँ और मौजू तौर पर करना भी नहीं चाहता परंतु एक सवाल तो उठता है की विकास व् सफलता का मानक क्या है? कोई सरकार क्या करे तो उसे सफल घोषित किया जाएगा ? कोई मानक तो होना चाहिए ना। 5 साल तो बुनियादी काम काज की रुपरेखा बनाने में ही गुजर जाते फिर सरकार को तो अभी 1 साल ही हुए हैं । योजनावार आकलन किया जाए तो कोई सरकार विकास के पैमाना पर खड़ा नहीं उतरेगी। खैर अगर पीछे मुड़ें और देखें तो अटल जी की सरकार जब सत्ता से बेदखल हुई थी तो किसी फ़्रांसिसी विद्वान एवं चिंतक ने कहा था भारतीय लोकतंत्र के लिए काला दिन है। ऐसा उन्होंने सिर्फ इसलिए नहीं कहा था क्योंकि उन्हें अटल जी से प्यार था या वगैरह वगैरह। उन्होंने ऐसा तत्कालीन सरकार के लोक कल्याणकारी योजना और विकास कार्यों के बदौलत कहा था जिसकी फसल संप्रग सरकार अपने पहले कार्यकाल में काटी थी जबकि दूसरे कार्यकाल में उसका पुलिंदा बंध गया और सरकार का काला चिट्ठा सामने आने लगा। तत्कालीन सरकार के योजनाएं जैसे स्वर्णिम चतुर्भुज योजना , अंत्योदय योजना , प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना आज भी चल रही हैं और काफी सफल भी साबित हो रही हैं। कहा जाता है अटल जी को तो पुरे 5 साल सरकार के कामकाज और देश के विकास का खाका खींचने में लग गया और सरकार चली गयी। यहाँ अटल जी का जिक्र मोदी सरकार से करना जरुरी है क्योंकि मोदी के सरकार में आने से पहले भी हालात ऐसे ही थे जैसे अटल जी के सामने। दरअसल भारत का दुर्भाग्य है की यहाँ विकास का मानक है सब्सिडी और लोकलुभावन योजनाएं । विदेश नीति , गृह नीति , प्रौद्योगिकी एवं ढाँचागत विकास से उसका कोई लेना देना नहीं हैं।
खैर मैं योजनावार बात नहीं करना चाहता परंतु दो तीन बातों अवश्य जिक्र करना चाहूँगा की अगर मोदी सरकार की सफलता कुछ है तो यह है की लोग अब आशा वादी हो गए हैं , जो निराशा का माहौल था संप्रग 2 के दौरान वह कुछ हद तक छँटा है । लोग और समाज में चर्चा होने लगी है। मोदी ने विपक्षियों को विकास की राजनीति के लिए बाध्य किया है। कालाधन पर चर्चा हो रही है। विदेश नीति पटरी पर आ रही हैं। कल्याणकारी योजना अपने जगह हैं ,और योजना लाना सरकार का दायित्व भी है और हमारा अधिकार भी। कोई एहसान नही करे हम पर।
अंत में ....
मेरी नहीं विश्लेषकों की वही बात..
"आप प्रधानमंत्री ( मोदी) को पसंद ना करें ठीक है ,
पसंद करें यह भी ठीक । पसंद और विरोध करने वाले करते रहेंगें परन्तु इतना तो तय है आप उन्हें नकार नहीं सकते।"
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