"जनता परिवार या तीसरे मोर्चे का गुब्बारा "

इसमें कुछ भी नया नहीं की जनता परिवार फिर एकजुट होने की कोशिश करता है और उसका गुब्बारा मुक़म्मल फूलने से पहले ही फूट जाता है। बहुतेरों को नया लग सकता पर मुझे तो ऐसा किसी भी दृष्टि से नया नहीं लगता ; जुड़ना, टूटना ,बिखड़ना ,एक होने का दंभ भड़ना सब होता चला आ रहा है विगत 38 सालों से । आखिर मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ ? दरअसल मामला यह है की जिस जनता परिवार की ये दुहाई देते हैं उसकी नियति और बुनियाद ही पड़ती है संकट के समय में। जाहिर सी बात है की संकट के वक्त में सब एकजुट होंगें ही और तत्पश्चात अगर मौका सही लगा तो अलग हो ही जाएंगे। याद किया जाए यही जनता परिवार जब इतिहास बना रहा था और इतिहास की प्रचंड बहुमत की सरकार बनाई थी सब दलों ने एकजुट होकर, तो एक आदर्श स्थिति बनी थीं। परंतु कुछ महत्वाकांक्षी और लोभी नेताओं ने जनता परिवार को ऐसा तोड़ा की आज भी जनता परिवार एकजुट नहीं हो पाया है। अनेकों मौके आये देश चलाने के परंतु हर किसी ने एक दूसरे की टाँग खिंचना नहीं छोड़ा। खैर.. कुछ दिनों से जनता परिवार का हो हल्ला और महागठबंधन की चिल्ल पों सुन रहा हूँ और सोच रहा हूँ नया क्या है इसबार ? ध्यान अगर हो तो 2004 से जबसे मैं सुनना समझना शुरू किया हूँ उस समय से ये लोग 2014 आम चुनाव तक तीसरे मोर्चे के नाम से दंभ भड़ा करते थे परंतु देश ने इस लायक नहीं छोड़ा की एक भी मोर्चा बनाया जा सके। अब जरा इनके अगुओं पर नजऱ दौड़ाई जाए ..
1) सर्वश्री लालू प्रसाद यादव - इतिहास के सबसे बुरे दौर में। विगत 10 सालों से सत्ता से बाहर हैं। जनाधार लगातार कम होता जा रहा है। 2009 लोकसभा में जहाँ इन्हें 4 सीट मिली थी वहीँ 2014 में भी 4 सीट मिले, बस सीट बदल गया और सारे कद्दावर नेता चुनाव हार गए। खुद चुनाव लड़ नहीं सकते।
विधान सभा में भी दहाई तक सीमित हो गए हैं तत्काल 22 सीट। पार्टी दो फार हो चुकी है। बेटों के भविष्य की चिंता।
2) नीतीश जी - तत्काल सत्ता में । परंतु भाजपा से गठबंधन टूटना और मांझी जदयू के लिए नया चुनौती पेश कर रहे हैं। अस्तित्व व पार्टी के दो फार होने का संकट।
3) मुलायम सिंह - 2014 लोकसभा में परिवार तक ही सिमट कर रह गए और मिले महज 5 सीट। मोदी से निपटना चुनौती । युवा और एक खास तबका नाराज। वर्तमान में अस्तित्व का संकट। क़ानूनी और राजनितिक दिक्कत। सत्ता से लोहा लेने के लिए नए मोर्चे की जरुरत।
4) देवगौड़ा - उम्र के अंतिम पड़ाव पर । पार्टी का जनाधार लगातार सिमटता हुआ। बेटों के भविष्य की चिंता। 2013 विधानसभा में कर्णाटक में महज 40 सीट से संतोष।
5) अजित सिंह - 2014 लोकसभा में खाता भी नहीं खोल सके। विधानसभा में प्रभाव नहीं। मुजफ्फरनगर दंगा ने जाट वोट बैंक को तबाह कर दिया।
6) वामपंथी पार्टीयां -इतिहास बनकर रहने के कगार पर । कोई जनाधार नहीं । धर्मनिरपेक्षता और विरोध काम है बस। सोच में व्यापक सुधार की आवश्यकता।
कुल मिला कर देखा जाए तो जनता परिवार या तीसरा मोर्चा में परिवार बचा है बस जनता तो दूर दूर तक नहीं दिखती। साम्प्रदायिकता के अलावा मुद्दे व इच्छाशक्ति का आभाव। साड़े नेता उम्रदराज। युवा सोच या युवाओं को खुद से जोड़ने का खाका नहीं। कुल जमां पूँजी सारे पैंतरेबाजी परिवार बचाने का जद्दोजहद है भड़ है बस।
खैर यह भी सही तीसरा मोर्चा हो या जनता परिवार सब को देखा जाएगा। इन्हें अतिआत्मविश्वास ले डूबेगा।

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